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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास और उद्देश्य

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास और उद्देश्य

    Congress History in Hindi: कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। वर्तमान में मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस न केवल एक राजनीतिक पार्टी के रूप में है बल्कि आजादी के आंदोलन में भी कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यहां तक कि आजादी के बाद भी लगभग कई सालों तक कांग्रेस का ही शासन देश में रहा था।

    एक वक्त था जब इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी को केंद्र की सत्ता में पूरे 25 सालों तक कोई टक्कर नहीं दे सका। लेकिन अब यह हाल हो गया है कि मात्र कुछ ही राज्यों की सत्ता में कांग्रेस की मौजूदगी है।

    कांग्रेस की स्थापना से लेकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक यह पार्टी तीन भागों में विभाजित हुई, जिसमें कांग्रेस का उदारवादी, कांग्रेस का उग्रवादी और कांग्रेस का गांधी वादी युग था। स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस को समाप्त कर देने के बात कह दी लेकिन उसके बाद भी यह पार्टी एक राजनीतिक दल में कार्य करती रही और भारत की एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई।

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक उद्देश्य

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना निम्नलिखित उद्देश्य के साथ हुई थी:

    • ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना एवं राष्ट्रीयता के आधार पर देश में सुधार लाना।
    • देशवासियों के बीच मित्रता सद्भावना का संबंध स्थापित करना।
    • राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक मुद्दों को हल करना एवं शिक्षित वर्ग को एकजुट करना।
    • धर्म, जाति, वंश या प्रांतीय विद्वेष को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता का विकास करना और इसे और भी ज्यादा सुदृढ़ बनाना।
    • भविष्य में राजनीतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार कर उस पर एकजुट होकर विचार विमर्श करना।
    • भारत के विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रहित के लिए काम कर रहे व्यक्तियों के बीच मित्रता और घनिष्ठता बढ़ाना।

    कांग्रेस की स्थापना का इतिहास (Congress History in Hindi)

    भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की स्थापना 25 दिसंबर – 27 दिसंबर 1885 को सिविल सर्विस के सेवानिवृत्त अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने शिक्षित भारतीय के प्रयासों किया था।

    हालांकि ऐसा नहीं था कि केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नेतृत्व संचालन करने के लिए एकमात्र संस्था थी बल्कि इससे पहले भी दो संस्थाओं का निर्माण किया गया था। 1857 में भारत के स्वतंत्रता का सबसे बड़ा आंदोलन खत्म होने के बाद भी भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति विरोध बढ़ते ही जा रहा था।

    उसी दौरान 1876 ईसवी में सुरेंद्र नाथ बनर्जी एवं आनंद मोहन बोस ने इंडियन एसोसिएशन नामक एक संस्था की स्थापना की। उसके कुछ दिनों के बाद पुणे में भी एक सार्वजनिक सभा नामक संस्था का निर्माण किया गया। इन दोनों संस्थाओं के निर्माण से भारत आंदोलन प्रतिदिन शक्तिशाली होते जा रहा था।

    तब 1883 ईसवी में एओ ह्युम ने कोलकाता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक पत्र प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने भारत के सामाजिक, राजनीतिक एवं नैतिक उत्थान के लिए एक संगठन बनाने की अपील की थी। इनके प्रकाशित पत्र ने अनेक पढ़े-लिखे भारतवासियों और महादेव गोविंद रानाडे, दादा भाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे कुछ अग्रणी समाज सेवकों को काफी ज्यादा प्रभावित किया।

    हालांकि भारत में युवा पहले से किसी ऐसे संगठन की आवश्यकता को महसूस कर रहे थे लेकिन ए. ओ ह्यूम के इस पत्र ने इस संगठन के निर्माण में उन्हें काफी ज्यादा प्रेरणा दी। जिसके बाद राष्ट्रीय नेताओं तथा सरकार के उच्च पदाधिकारियों के विचार विमर्श से इंडियन नेशनल यूनियन की स्थापना की गई।

    उसके बाद भी यह क्रम चलता ही रहा। इस संगठन की स्थापना के बाद बंगाल में “नेशनल लीग”, मुंबई में प्रेसिडेंसी एसोसिएशन एवं “मद्रास महाजन सभा” की स्थापना की गई।

    जिसके बाद ए.ओ ह्यूम इंग्लैंड जाकर ब्रिटिश प्रेस और सांसदों से विचार विमर्श करने के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि को तैयार किया और इस तरह 28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस का पहला अधिवेशन श्री व्योमेशचंद्र बनर्जी के अध्यक्षता में मुंबई में आयोजित किया गया।

    इस तरह ए.ओ ह्यूम को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संस्थापक या जनक कहा जाता है। 1890 में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रथम महिला स्नातक कादंबिनी गांगुली ने कांग्रेस को संबोधित किया, जिसके बाद कांग्रेस में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती ही चली गई। लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस को सेफ्टी वॉल की उपमा दी थी। इस संगठन के निर्माण ने भारतीयों को स्वतंत्रता की लड़ाई में नेतृत्व किया।

    इंडियन नेशनल यूनियन नाम से हुई थी स्थापना

    शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे एक बड़े संगठन के निर्माण का बीड़ा उठाया गया था तब सितंबर 1884 में थियोसॉफिकल सोसायटी के मद्रास अधिवेशन में इंडियन नेशनल यूनिटी नाम से एक देशव्यापी संगठन की स्थापना की गई थी। लेकिन 25 दिसंबर 1884 को इसका नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर दिया गया था, जो नाम दादाभाई नौरोजी की सलाह पर दिया गया था।

    कांग्रेस का पहला विभाजन

    कांग्रेस का पहला विभाजन लगभग इसके स्थापना के 20 वर्षों के बाद 1907 में हुए सूरत अधिवेशन में हुआ था, जिसका कारण दो विपरीत विचारधाराओं का उदय माना जाता है। दरअसल 1905 में जब कांग्रेस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में बनारस में पूरा हुआ तो उसी समय उदारवादी और उग्रवादी के मतभेद सामने खुलकर आने लगे।

    दरअसल उग्रवादी के नेता बाल गंगाधर तिलक चाहते थे कि स्वदेशी आंदोलन एवं बहिष्कार आंदोलन न केवल बंगाल तक सीमित रहे बल्कि भारत के अन्य हिस्सों तक भी फेले और इस आंदोलन में अन्य संस्थाओं को भी सम्मिलित करके इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन का स्वरूप दिया जाए।

    वे उदार वादियों का ब्रिटिश सरकार के प्रति उदार एवं सहयोग के नीति की कटु आलोचना कर रहे थे। लेकिन वहीं पर उदारवादी नेता लोग चाहते थे कि बंगाल विभाजन का विरोध संवैधानिक तरीके से किया जाए, जिसके लिए ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करने का समर्थन चाहते थे। वे इस आंदोलन के साथ अन्य संस्थाओं को जोड़ना नहीं चाहते थे, केवल बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे।

    वहीं उग्रवादी चाहते थे कि अगले अधिवेशन में उनके इस मांग को स्वीकृत किया जाए। इसीलिए अगले अधिवेशन में उग्रवादी बाल गंगाधर तिलक या लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। वहीं नरम पंथियों के नेता डॉक्टर रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव किए थे। लेकिन अंत में दादा भाई नौरोजी को दिसंबर 1906 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया।

    इस अधिवेशन में तत्कालीन सांप्रदायिक दंगों एवं क्रांतिकारी आतंकवाद तथा उग्रवादियों की लोकप्रियता में वृद्धि के कारण उदारवादी का प्रभाव कम हो गया। जिसके फलस्वरूप स्वदेशी बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया गया।

    इस अधिवेशन में पहली बार “स्वराज्य” शब्द का नाम लिया गया लेकिन उसकी व्याख्या स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी। जिसके बाद इस विषय पर उदारवादी एवं उग्रवादियों में काफी बहस छिड़ी थी। इस अधिवेशन में ब्रिटेन एवं अन्य उपनिवेशओं की तरह स्वराज्य या स्वशासन को कांग्रेस ने अपना लक्ष्य घोषित कर दिया।

    इस अधिवेशन में उग्रवादियों की मांग को स्वीकार किया गया और इस उपलब्धि से उत्साहित होकर उग्रवादियों ने अहिंसात्मक प्रतिरोध, शिक्षा संस्थाओं, नगर निकायों इत्यादि का बहिष्कार करने की मांग प्रारंभ कर दी। हालांकि इस अधिवेशन के बाद उग्रवादी एवं नरम पंथो के बीच मतभेद बढ़ते ही चले गए।

    उग्रवादी मानते थे कि यह समय भारतीयों में स्वतंत्रता आंदोलन को पूर्ण रूप से प्रारंभ करने का बिल्कुल उचित समय है। क्योंकि अभी भारतीयों में अभूतपूर्व उत्साह है। ऐसे में ब्रिटिश शासन पर सबको मिलकर आघात किया जाना चाहिए और उन्हें जड़ से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए। यहां तक कि वे नरमपंथियो को इस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे, जिस कारण वे स्वतंत्रता अभियान से उन्हें अलग कर देना चाहते थे।

    वहीं उदारवादी लोग मानते थे कि उग्रवादियों का साम्राज्यवाद विरोधी अभियान से इस समय जुड़ना उचित नहीं है। क्योंकि वे लोग निकाय सुधारों के द्वारा ब्रिटिश प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी का स्वप्न पूरा करना चाहते थे और उनके अनुसार उग्रवादियों के इस कारनामे के कारण उनका यह स्वप्न पूरा नहीं हो पाता।

    इधर उदारवादी अनुमान नहीं लगा पा रहे थे कि सरकार के द्वारा काउंसिल सुधारों का जो वास्तविक उद्देश्य था, वह उग्रवादियों को उदारवादियों से अलग करने का था ना कि उन्हें कोई उपहार दिया गया था।

    इधर दोनों ही पक्ष यह समझ नहीं पा रहे थे कि भारत जैसे विशाल उपनिदेशक देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त करने के लिए एक विशाल राष्ट्रवादी आंदोलन और आपसी एकता की जरूरत है। लेकिन ये दोनों विचारधाराएं भारतीय एकता को कमजोर कर रहे थे।

    उसके बाद समय आया 1907 के कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन का। उस समय उग्रवादी लोग चाहते थे कि इस अधिवेशन का आयोजन नागपुर में किया जाए और बाल गंगाधर तिलक या फिर लाला लाजपत राय को अध्यक्ष चुना जाए। इसके साथ ही स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन तथा राष्ट्रीय शिक्षा के पूर्ण समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया जाए।

    वहीं दूसरी ओर उदारवादी नेता लोग 1907 के अधिवेशन को नागपुर के बजाय सूरत में करवाना चाहते थे और सूरत केंद्रीय प्रांत मुंबई के अंतर्गत आता था, इसीलिए वे मेजबान प्रांत के नेताओं को कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने की वकालत में थे। दूसरी ओर वे रासबिहारी बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे। इसके साथ ही स्वदेशी बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्ताव को वापस लेने की जोरदार मांग कर रहे थे।

    दोनों ही पंथो के नेता अपनी अपनी मांगों पर अड़ चुके थे। चूंकि उस समय कांग्रेस में उदार वादियों का वर्चस्व था, जिसके कारण 1907 का अधिवेशन सूरत में आयोजित किया गया और ब्रिटिश शासन की सीमा में रहते हुए स्वराज्य एवं प्रशासन आंदोलन को सविधान तरीके से जारी रखने का निर्णय लिया।

    जिसके परिणाम स्वरूप उग्रवादियों ने उदार वादियों से अपना अलग रास्ता बना लिया और इस तरीके से 1907 में उदारवादी और उग्रवादी दो विचारधाराओं में कांग्रेस बट गया।

    कांग्रेस विभाजन में सरकार की रणनीति

    कांग्रेस के प्रथम विभाजन का कारण केवल इन दोनों पक्षों के मध्य के विवादों का परिणाम ही नहीं बता सकते बल्कि इसके पीछे सरकार की भी सोची समझी रणनीति कार्य कर रही थी।

    दरअसल कांग्रेस की स्थापना के कुछ वर्षों तक ब्रिटिश सरकार का रुख कांग्रेस के प्रति सहयोगात्मक था। क्योंकि उस समय कांग्रेस में उदारवादी का वर्चस्व था। कांग्रेस ने प्रारंभ से ही उग्र राष्ट्रवाद से स्वयं को दूर रखा था लेकिन बाद के कुछ वर्षों में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन के उभरने से ब्रिटिश सरकार का कांग्रेस के प्रति मोह भंग होने लगा।

    ऐसे में ब्रिटिश सरकार ने रणनीति चली और वह उदारवादियों को डराने के लिए उग्रवादियों के साधारण दमन कि नीति अपनाने लगे। जिसके पहले चरण में उन्होंने उदारवादियों के साथ बैठक की और उनके कुछ मांगो पर सहमिति जताई। उन्हें आश्वासन दिया कि वे खुद को उग्रवादियों से दूर रखेंगे तो देश में संवैधानिक सुधार संभव हो पाएगा।

    ब्रिटिश सरकार के उदारवादियो की मांग को पूरा करने के पीछे का उद्देश्य उग्रवादियों को उनसे अलग करके उन लोगों के द्वारा सरकार के खिलाफ हो रहे आंदोलन में उनकी एकता को कमजोर करना चाहते थे। उदारवादियों की मांग को पूरा करके उग्रवादियों का दमन करना उनके लिए काफी आसान हो रहा था।

    इसीलिए उन्होंने उनकी मांग में सहमति दिखाई। लेकिन उदारवादी उस समय ब्रिटिश सरकार के इस मनसा को समझ नहीं पाए, जिसके परिणाम स्वरूप उग्रवादी और उदारवादी दोनों ही अंग्रेजों के रणनीति के शिकार हो गए।

    जिसके बाद जब 1908 में उग्रवादी और नरमवादी दोनों पक्षों का विभाजन हो गया तब 1908 से लेकर 1911 के तक सरकार विरोधी आंदोलन को खत्म करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने पांच नए कानून बना दिए थे, जिसमें राजद्रोही सभा अधिनियम 1907, भारतीय समाचार पत्र अधिनियम 1908, फौजदारी कानून अधिनियम 1908 तथा भारतीय प्रेस अधिनियम 1910 प्रमुख थे।

    उन्होंने उग्रवादी के मुख्य नेता बाल गंगाधर तिलक को भी गिरफ्तार करवाकर बर्मा के जेल में भेज दिया। जिसके बाद सरकार विरोधी आंदोलन धीरे-धीरे निश प्रभावित होने लगा। इधर विपिन चंद्रपाल और अरविंद घोष भी राजनीती से संयास ले लिया।

    लाला लाजपत राय भी विदेश चले गए, जिसके कारण उग्रवादी नेता लंबे समय तक आंदोलन को जारी रखने में असफल रहे। उदार वादियों ने भी भारतीय युवाओं का समर्थन धीरे-धीरे खो दिया।

    कांग्रेस के दोनों विचारधाराओं का एकीकरण

    1907 में जब कांग्रेस का दो पक्षों में विभाजन हो गया तब 1916 तक ब्रिटिश सरकार सरकार विरोधी आंदोलन को कुचलने में लगी रही। इधर मार्ले मिंटो सुधार से हिंदू और मुसलमानों के मध्य मतभेद गहरे होते चले गये। यहां तक कि 1915 में उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता की भी मृत्यु हो गई।

    जिसके बाद बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने गरम दल और नरम दल को मंच पर लाने का प्रयास किया। उसी समय इटली के त्रिपोली पर आक्रमण के पश्चात बाल्कन युद्ध प्रारंभ हो गया। लेकिन इस युद्ध में इंग्लैंड ने तुर्की का समर्थन नहीं दिया, जिसके कारण भारत के मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में प्रतिकूल प्रतिक्रिया शुरू हो गई और वे ब्रिटिश सरकार से नाराज़ हो गए हो गए।

    जिसके बाद 1915 के वार्षिक अधिवेशन में मुस्लिम संगठन ने अन्य संप्रदायों के परामर्श से राजनीतिक सुधार के लिए कांग्रेस नेताओं के साथ एक विशेष समिति का गठन करने का निर्णय लिया। आगे मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने एक ही समय अगले अधिवेशन को आयोजित करने का निर्णय लिया।

    फिर दिसंबर 1916 लखनऊ अधिवेशन में मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों ने अलग-अलग रूप से संवैधानिक सुधारों की संयुक्त योजनाओं के संबंध में प्रस्ताव पारित किया। इस तरीके से संयुक्त कार्यक्रम के आधार पर राजनीति क्षेत्रों में एक दूसरे के साथ सहयोग करने के संबंध में समझौता किया गया।

    जिस कारण लखनऊ अधिवेशन को लखनऊ समझौता भी कहा जाता हैं। इस तरीके से 1916 कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में उग्रवादी और उदारवादी विचारधारा फिर एक हो गई।

     

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन 25 दिसंबर से 28 सितंबर तक 1885 को मुंबई में स्थित गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय के सभागार में उमेश चंद्र बनर्जी के अध्यक्षता में आयोजित की गई थी।

    हालांकि यह अधिवेशन पुणे में आयोजित होने वाला था। लेकिन उस समय पूना में हैजा संक्रमण से लोग ग्रसित थे, जिसके कारण इस अधिवेशन को मुंबई में आयोजित किया गया।

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन में भारत के अलग-अलग प्रांतों से कुल 72 सदस्यों ने भाग लिया था। जिसमें दादाभाई नौरोजी, दिनशा वाचा, फिरोज शाह मेहता, एन. जी चंद्राकर, वी राघवाचार्य, काशीनाथ तेलंग आदि जैसे कुछ लोग शामिल थे।

    कांग्रेस की स्थापना को लेकर विभिन्न मत

    लाला लाजपत राय और सर विलियम वेडरबर्न ने कांग्रेस की स्थापना को लेकर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा था कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए एक सुरक्षा प्रणाली के रूप में थी। क्योंकि अंग्रेजों के शोषण, अत्याचार खास करके लिटन के धनात्मक कार्यों से भारतीयों में रोस बढ़ते ही जा रहा था।

    ऐसे में एमओयू गृह सचिव होने के कारण उन्हें पुलिस के गुप्त रिपोर्टर को पढ़ने का अवसर मिल गया। जिससे उनको भारत आंतरिक और भूमिगत षड्यंत्र के बारे में पता चल गया। ऐसे में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सुरक्षा साधन की आवश्यकता थी और इसी उद्देश्य से भारत के बुद्धिजीवी को अराजकता पूर्ण कार्यों से अलग रखने के लिए कांग्रेस जैसे एक राजनीतिक संगठन को स्थापित किया गया।

    वहीं 1898 में कांग्रेस के प्रथम सभापति व्योम चंद्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के पीछे अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि कांग्रेस की स्थापना के पीछे वायसराय लॉर्ड डफरिन का षड्यंत्र विचार था।

    अधिकांश विद्वानों का कांग्रेस की स्थापना को लेकर मत था कि कांग्रेस की स्थापना भारत की राष्ट्रीय चेतना का स्वाभाविक विकास था। कुछ विद्वान जो. ह्यूम पर सुरक्षा प्रणाली और आरोप साम्राज्य रक्षक के रूप में चित्रित करना उचित नहीं मानते थे।

    क्योंकि उनके अनुसार एओ. ह्यूम शुरुआत से ही भारतीयों के प्रति मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाया था। वे एक उदारवादी व्यक्ति थे, इसीलिए उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस संगठन के निर्माण का सुझाव दिया।

    1950 में नंदलाल चटर्जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना को लेकर एक विचार व्यक्त किया कि इस संगठन की स्थापना रूस के भय के कारण हुई। क्योंकि रूस ने 1884 में मार्व पर और 1850 ईसवी में पंजदेह पर अधिकार कर लिया था, जिस कारण इंग्लैंड को भारत के साम्राज्य की चिंता होने लगी थी। एनी बेसेंट ने अपना विचार प्रकट किया था कि उन्होंने भारत के कल्याण का विचार रखते हुए अखिल भारतीय संस्था की स्थापना की थी।

    कांग्रेस के बारे में रोचक तथ्य

    • कांग्रेस पार्टी के प्रथम अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी को 1986 में चुना गया था। दादा भाई नौरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस के संसद में शामिल होने वाले प्रथम भारतीय थे।
    • कांग्रेस की स्थापना शुरुआत में इंडियन नेशनल यूनियन के नाम से की गई थी। लेकिन बाद में दादाभाई नौरोजी की सलाह पर इसका नाम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा गया था। यह शब्द उत्तर अमेरिका से लिया गया शब्द है, जिसका अर्थ लोगों का समूह होता है।
    • कांग्रेस का पहला अधिवेशन मुंबई में 1885 में हुआ था, जिसमें भारत के अलग-अलग प्रांतों से 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।
    • जिस समय कांग्रेस की स्थापना हुई थी, उस समय गवर्नर जनरल लॉर्ड डफरिन थे और भारत सचिव लॉर्ड क्रॉस थे।
    • कांग्रेस शुरुआत में उदारवादी भावना रखती थी, जिस कारण ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को अपना सुरक्षा कवच समझकर सहयोग दिया। लेकिन जब कांग्रेस ने संवैधानिक सुधारों की मांग करना शुरू की तब अंग्रेजों का कांग्रेस से मोहभंग होने लगा।
    • कांग्रेस का अंतिम अधिवेशन यानी संतानवां अधिवेशन 1950 में महाराष्ट्र के नासिक जिले में पुरुषोत्तम दास टंडन के अध्यक्षता में हुआ था।
    • कांग्रेस से पहले कई छोटे-छोटे दलों का निर्माण हुआ था, जो कांग्रेस निर्माण के बाद कांग्रेस में विलीन हो गया।
    • कांग्रेस के निर्माण ने भारतीय इतिहास में एक नया युग प्रारंभ किया। इसने आगे कई स्वतंत्रता संबंधित आंदोलन में सहयोग दिया।
    • कांग्रेस के 22वें अधिवेशन 1906 में पहली बार स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया गया था।
    • लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, मोहम्मद अली जिन्ना, गोपाल कृष्ण गोखले, कांग्रेस के कुछ प्रमुख शुरुआती नेताओं में से थे। जिनमें मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू मुस्लिम एकता का पक्ष रखने वाले प्रमुख नेता थे, जो आगे चलकर मुस्लिम लिग के नेता और पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर बने थे।
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष श्रीमती सरोजनी नायडू थी, जिन्हें कांग्रेस के 41वें अधिवेशन जो कानपुर में 1925 में आयोजित हुआ था, उसमें उन्हें अध्यक्ष बनाया गया था।
    • 1915 में साउथ अफ्रीका से गांधी जी के लौटने के पश्चात उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था, जिसके बाद 1920 में उन्हीं के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन की भी शुरुआत की गई थी। लेकिन 5 फरवरी 1922 में चोरा चोरी कांड में पुलिस वालों की हत्या का जब गांधीजी ने विरोध किया तब कांग्रेस बिखर गई और कुछ अन्य नेताओं ने मिलकर अलग स्वराज्य पार्टी का निर्माण कर लिया।
    • सत्याग्रह आंदोलन के कारण गांधीजी की लोकप्रियता के चर्चे काफी फेलने लगे, जिसके कारण कांग्रेस से पहले अलग हुए कई नेता फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए। जैसे कि जयप्रकाश नारायण, पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, खान अब्दुल गफ्फार खान आदि।
    • 1911 में कोलकाता में हुए कांग्रेस के 27वें अधिवेशन में पहली बार रविंद्र नाथ टैगोर के द्वारा रचित भारत का राष्ट्रीय गान जाना गाना माना गाया गया था।
    • 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज की मांग की गई और 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज्य दिवस मनाया गया, जिसे गणतंत्र दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है।
    • 1940 में द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने पर ब्रिटिश सरकार ने बिना भारतीयों के अनुमति के भारतीयों को इस युद्ध में शामिल कर दिया, जिस कारण सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और फिर 1943 में सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना की, जिसमें उन्हें जापान का सहयोग मिला।
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयबजी थे, जो कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन जो मद्रास में 18 87 में आयोजित हुआ था, उसमें बने थे।
    • भारत सरकार कानून 1935 के तहत पहली बार भारत में 11 प्रांतों में चुनाव आयोजित किए गए थे, जिसमें बंगाल, पंजाब और सिंध को छोड़कर बाकी 8 प्रांतों में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की। मुस्लिम लीग ने किसी भी प्रांत में मत हासिल नहीं किया था।
    • कांग्रेस न केवल आजादी से पहले बल्कि आजादी के बाद भी प्रमुख दल बनकर उभरी। 1952 में पहली बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस न केवल कई राज्यों में सरकार बनाने में सक्षम हुई बल्कि केंद्र में भी सरकार बनाने में सक्षम हुई। 1977 तक केंद्र में कांग्रेस की सत्ता रही लेकिन बाद में जनता दल के द्वारा उसे पराजित होना पड़ा। फिर 1980 से लेकर 1989 के बीच कांग्रेस केंद्रीय सत्ता में आई। लेकिन 1989 में दोबारा पराजय का सामना किया, जिसके बाद 2004 से लेकर 2009 तक फिर से भारत में कांग्रेस की सरकार रही। उसके बाद फिर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई। इस तरह देखा जाए तो कांग्रेस भारत में कुल 49 सालों तक सत्ता में रही।

    FAQ

    कितने सालों तक कांग्रेस भारतीय सरकार के रूप में कार्यरत रही?

    कांग्रेस 49 सालों तक भारतीय सत्ता में रही, जिसमें 6 बार बहुमत के साथ और चार बार गठबंधन के साथ थी। 2014 तक कांग्रेस आम चुनाव में से 6 में पूर्ण बहुमत के साथ जीती थी।

    कांग्रेस पार्टी के अब तक कुल कितने प्रधानमंत्री रह चुके हैं?

    देश के आजादी से लेकर अब तक भारत में कुल 14 बार कांग्रेस पार्टी के नेता प्रधानमंत्री के पद पर रह चुके हैं, जिसमें प्रथम कांग्रेस पार्टी से प्रधानमंत्री भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। वहीं अंतिम प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह रहे हैं।

    कांग्रेस का विभाजन कब हुआ था?

    सबसे पहले कांग्रेस का विभाजन 1960 में सूरत अधिवेशन में हुआ था, उस समय कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रासबिहारी घोष थे। उस समय कांग्रेस गरम दल और नरम दल दो दलों में विभाजित हो गया। गरम दल के प्रमुख नेता में बाल गंगाधर तिलक थे।

    कांग्रेस अधिवेशन के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष कौन थे?

    कांग्रेस का चौथा अधिवेशन इलाहाबाद में 1988 में आयोजित हुआ था, जिसमें जॉर्ज यूल कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष थे।

    कांग्रेस के कराची अधिवेशन की क्या विशेषता थी?

    1931 में कांग्रेस का 46 वां अधिवेशन कराची में आयोजित किया गया था, जिसके अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे। जिसमें मौलिक अधिकार की मांग की गई थी।

    राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष कब तक थे?

    राहुल गांधी 2017 से लेकर 2019 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। 26 अक्टूबर 2022 से लेकर वर्तमान में मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।

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