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भगत सिंह का जीवन परिचय, फांसी, Bhagat Singh Biography in Hindi

    भगत सिंह का जीवन परिचय, फांसी, Bhagat Singh Biography in Hindi

    Bhagat Singh Biography in Hindi: शहीद भगत सिंह भारतीय आजादी के महान विभूति है। आज भारत का प्रत्येक व्यक्ति जो स्वतंत्रता से अपने घर में रह पा रहा है, उसे शहीद भगत सिंह के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। महज 23 साल की उम्र में इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने देश के लिए अपना प्राण निछावर कर दिया।

    जिस जमाने में बड़े-बड़े लोग अपनी आवाज लंदन तक नहीं पहुंचा पाते थे, उस जमाने में एक गरीब घर से ताल्लुक रखने वाले भगत सिंह ने कलम की ताकत पर ना केवल इंग्लैंड बल्कि रूस और इटली जैसे देशों को अपना दीवाना बना दिया था।

    भगत सिंह लेनिन और कार्ल मार्क्स जैसे लोगों की किताबें पढ़ते थे और अलग-अलग मैगजीन और न्यूज़पेपर में अपने विचार को आर्टिकल का रूप देकर लोगों के समक्ष रखते थे, जिसे पढ़कर बड़े-बड़े लोगों के दिल दहल जाते थे।

    आज भारत के प्रत्येक नागरिक को भगत सिंह का जीवन परिचय पता होना चाहिए। हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम जाने कि भगत सिंह कौन थे?, उन्होंने देश के लिए कौन सा बलिदान दिया और कैसे हमने अपनी स्वतंत्रता को अंग्रेजों से छीना है।

    यहाँ पर हम भगत सिंह का जीवन परिचय हिंदी में शेयर कर रहे है, जिसमें इनके प्रारंभिक जीवन, शिक्षा, परिवार, इनके द्वारा किये गये आन्दोलन, फांसी की सजा आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है।

    भगत सिंह का जीवन परिचय (Bhagat Singh Biography in Hindi)

    नाम भगत सिंह
    जन्म और जन्म स्थान 27 सितंबर 1960, बंगा गाँव, तहसील जरनवाला, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
    पिता का नाम सरदार किसान सिंह
    माता का नाम विद्यावती
    वैवाहिक स्थिति अविवाहित
    शिक्षा डी.ए.वी. हाई स्कूल (लाहौर), नेशनल कॉलेज (लाहौर)
    आन्दोलन भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
    प्रमुख संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएसन, नौजवान भारत सभा
    प्रसिद्धि क्रांतिकारी
    जीवनकाल 23 वर्ष
    स्मारक द नेशनल शहीद मेमोरियल, हुसैनवाला, पंजाब
    मृत्यु 23 मार्च 1931 को 7: 33 बजे (फांसी), लाहौर (पाकिस्तान)
    फांसी का कारण बड़े अंग्रेजी सरकार के अधिकारी की हत्या का आरोप

    भगत सिंह का जन्म और प्रारम्भिक जीवन

    भगत सिंह ने एक साधारण सिख परिवार में 27 सितंबर 1907 को बंगा गाँव, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में जन्म लिया था। उनके पिता सरदार किशन सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी और साधारण किसान थे। उनकी माता विद्यावती एक गृह महिला थी।

    भगत सिंह ने अपने घर में बचपन से ही देशभक्ति का माहौल देखा था। देश के प्रति प्राण त्याग कर देने वाले माहौल के वजह से वह देश के लिए कुछ करना चाहते थे। उनके चाचा अजीत सिंह पंजाब के बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी माने जाते थे।

    उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन बनाई थी, जिसके तहत अलग-अलग आंदोलन और मुद्दे को सरकार के सामने उठाया था, जिसके तहत उनके चाचा पर 22 मुकदमे दर्ज किए गए थे। पुलिस जब उन्हें बहुत तेजी से ढूंढने लगी तो पंजाब छोड़कर उन्हें ईरान जाना पड़ा।

    उसी दौरान भगत सिंह पढ़ाई के लायक हो गए और उनके पिता ने उनका दाखिला एंग्लो वैदिक पब्लिक स्कूल में करवाया। उस दौरान भगत सिंह को अलग-अलग तरह की किताब, जीवनी, मैगजीन और न्यूज़ पेपर पढ़ने की लत लगी।

    जिसे पढ़कर उन्होंने अंग्रेज सरकार और पूरे विश्व में अलग-अलग जगहों पर किस प्रकार आंदोलन उठाया जा रहा है?, रसिया की क्रांति कैसे हुई?, फ्रांस की क्रांति और भी अलग-अलग क्रांति और विचारों को विश्व के प्रचलित किताबों में पढ़ा।

    अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका परिवार चाहता था कि वह एक नौकरी करें और शादी करके अपना जीवन यापन करें। मगर भगत सिंह इस बात से बहुत गुस्सा हुए और कहा कि अपनी जिंदगी को उन्होंने देश के नाम किया है और अंग्रेजों को खुलेआम ललकारना शुरू किया। गांधी जी की बातों से प्रेरित होकर भगत सिंह ने गांधीजी के आंदोलनों में उनको सहायता करनी शुरू की।

    भगत सिंह का क्रांतिकारी जीवन

    भगत सिंह एक बहुत महान क्रांतिकारी थे, जिनके किस्से बहुत पुराने हो चुके हैं। मगर आज के समय में भी कोई उनके किस्से को सुन ले तो उनका खून खौल उठेगा। आज प्रत्येक व्यक्ति को भगत सिंह के जीवन परिचय को पढ़ना चाहिए और भगत सिंह के जीवन से सीख लेनी चाहिए कि उन्होंने अपने मन को कितना मजबूत बनाया होगा कि 23 साल की उम्र में अपने देश के लिए अपना जान देने से पहले एक बार भी नहीं सोचा।

    भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत 1919 में जलियांवाला बाग कांड के बाद हुई। इससे पहले भगत सिंह अलग-अलग तरह के आंदोलन करते थे। मुख्य रूप से वह आंदोलन गांधी जी के आंदोलन को बढ़ावा देने का कार्य करते थे।

    मगर 1919 में असहयोग आंदोलन जब अपने चरम पर था तब अंग्रेजों के द्वारा जालियांवाला बाग नरसंहार किया गया, जिससे गांधी जी को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने उसी समय असहयोग बंद करने का फैसला लिया।

    इस बात से भगत सिंह को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने गांधी जी का साथ छोड़ कर एक नई पार्टी की स्थापना की। यहां से वह दौर शुरू हुआ, जब आजादी लेने के लिए दो अलग-अलग पार्टी भारत में तैयार हो गई।

    हालांकि यह दोनों एक दूसरे की बड़ी इज्जत करते थे। मगर पहला गुट इस बात पर आधारित था कि अंग्रेजों को मारकर इस देश से भगाया जाएगा तब हमें आजादी मिलेगी। दूसरा गुट गांधीजी के सिद्धांतों पर चलता था और सत्य अहिंसा की राह पर आजादी की मांग करता था।

    भगत सिंह के साथ जुड़ने वाले सभी लोग गरम दल के हिस्सा बने और उनके जीवन का मकसद अंग्रेजों के अत्याचार का बदला उन्हीं की भाषा में लेने से था। जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद भगत सिंह और उनके साथ के कुछ लोग बढ़-चढ़कर अंग्रेज सरकार से लड़ते थे। वह लोग अंग्रेज सरकार के दस्तावेज जला दिया करते थे। अंग्रेज सरकार में काम करने वाले लोगों को मार दिया करते थे।

    यह वही दौर था जब भगत सिंह अपने कॉलेज में बीए की परीक्षा दे रहे थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात सुखदेव थापर से हुई और इन दोनों की दोस्ती हो गई। उस दौरान कुछ और लोग भगत सिंह के गरम दल का हिस्सा बने और आजादी की लड़ाई में हर कोई बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे।

    भगत सिंह के घर के लोग उनकी शादी करवाना चाहते थे। मगर भगत सिंह ने साफ-साफ कह दिया कि अगर आजादी से पहले उनकी कोई दुल्हन होगी तो वह मौत होगी।

    इस दौरान भगत सिंह ने अंग्रेज सरकार के कार्य प्रणाली और किस तरह भारतीय सरकार का निर्माण होना चाहिए, किस तरह का अत्याचार वह कर रहे है और विश्व भर में किस तरह राजतंत्र को हटाकर प्रजातंत्र का योग आ रहा है, इन सब के बारे में अलग-अलग तरह के लेख न्यूज़पेपर और मैगजीन में लिखा करते थे, जिसे देश विदेश में भी लोग बहुत पसंद करने लगे। इस वजह से भगत सिंह की ख्याति बड़ी तेजी से फैलने लगी।

     

    भगत सिंह की आजादी की लड़ाई

    भगत सिंह ने देश को आजाद करने के लिए गांधी जी की सभा को चुना था। मगर असहयोग आंदोलन के बंद कर देना और अंग्रेजों के अत्याचार का जवाब किसी भी तरीके से ना देने की वजह से भगतसिंह बहुत गुस्सा हुए और नौजवान भारत सभा ज्वाइन की।

    भगत सिंह बहुत अच्छे लेखक थे, उनके लेखन से लोग बहुत प्रभावित होते थे। उन्हें पंजाबी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान था। भगत सिंह ने एक बड़े स्तर पर आंदोलन उठाने के लिए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक पार्टी को 1928 में बनाया, मिलिट्री पार्टी बनाया और चंद्रशेखर आजाद इसके प्रमुख बने।

    30 अक्टूबर 1928 को साइमन कमीशन इंग्लैंड से भारत में अंग्रेजों के काम करने के तरीके को देखने और परखने के लिए आए। Simon commission कुछ अंग्रेजों का गुट था, जो भारत को चलाने के बारे में बात करने वाले थे।

    भगत सिंह और लाला लाजपत राय इस बात से बहुत नाखुश थे कि हमारे देश में किस तरह की कार्यप्रणाली होगी, इसे समझने के लिए कुछ अंग्रेजों को रखा गया है। उसमें किसी भी भारतीय को नहीं रखा गया है, इसलिए उन्होंने साइमन कमीशन खूब बढ़कर विरोध किया और लाहौर रेलवे स्टेशन से खुद को पीछे नहीं हटाया।

    साइमन कमीशन में बहुत बड़े अंग्रेज अधिकारी बैठे थे, जो भारत में हो रहे विद्रोह को करीब से देख कर भारत के वायसराय के प्रति बहुत गुस्सा हुए। जिसका बदला लेते हुए भारत के वायसराय ने लाहौर रेलवे स्टेशन पर खड़े साइमन कमीशन का विरोध कर रहे लाला लाजपत राय और भगत सिंह के साथियों पर लाठीचार्ज किया। इस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की जान चली गई।

    भगत सिंह लाला लाजपत राय को अपने पिता समान मानते थे। उनकी मृत्यु के बाद भगत सिंह के अंदर गुस्से का एक सैलाब आया और उन्होंने लाठीचार्ज करने वाले पुलिस को मारने का ठान लिया।

    भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनों ने लाठीचार्ज का नेतृत्व कर रहे पुलिस को मारने का एक प्लान बनाया। पुलिस स्टेशन में जाकर उस पुलिस वाले को गोली मारकर चले गए। भगत सिंह और उनके साथियों की यह हरकत अंग्रेज सरकार के मुंह पर एक तमाचा थी।

    मगर भगत सिंह की इस हरकत से लोगों के प्रति उनके ख्याति इतनी ज्यादा बढ़ गई कि हर कोई भगत सिंह के पार्टी का हिस्सा बनना चाहता था और अंग्रेजों को मार कर देश से भगाना चाहता था।

    जिसके बाद भगत सिंह ने अपने पास आए भीड़ को इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया और पूरे देश में यह नारा जोर से गूंजने लगा और जगह-जगह लोगों ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़ना शुरू किया।

    भगत सिंह की मृत्यु कैसे हुई?

    भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव अपनी इंकलाब जिंदाबाद के नारे को और मजबूत करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक धमाका सुनाना चाहा और बम बनाकर लाहौर संसद में घुस गए और संसद के भवन में घुसकर उन्होंने एक जोरदार बम फोड़ा, जिससे पूरा संसद हिल गया।

    इस विस्फोट से कुछ लोगों को छोटी मोटी चोटे आई मगर किसी की जान लेने का इरादा उनका नहीं था। लेकिन इस विस्फोट के धमाके की गूंज ना केवल भारत में बल्कि अलग-अलग देशों में भी गूंजने लगी। हर कोई यह जानना चाहता था कि एक गुलाम देश में कौन बैठा है, जो अंग्रेज सरकार के घर में घुसकर बम फोड़ सकता है।

    कमजोरों की तरह वहां से भागने के बजाय भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव वहां खड़े होकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे और खुद को पुलिस के हवाले कर दिया। भगत सिंह के जेल में जाते ही पूरे भारत में एक सैलाब आ गया। हर नवयुवक लाहौर की तरफ भागने लगा। रास्ते में जो भी अंग्रेज ने उसे रोका, उसे पीट दिया गया।

    भगत सिंह ने जेल में अन्न और जल त्याग दिया। उन्होंने कहा कि वह अंग्रेज के हाथ से कुछ भी खाना पसंद नहीं करेंगे। यहां जेल के बाहर हर कोई भारत के बड़े-बड़े स्वतंत्रता सेनानी, जिसमें महात्मा गांधी का भी नाम था। उनसे लोगों ने विनती की कि वह अंग्रेज सरकार के खिलाफ आवाज उठाएं और भगत सिंह को जेल से बाहर निकलवाए।

    64 दिन तक उन्होंने जेल में भूख हड़ताल की, जिसके बाद उनकी हालत बहुत खराब हो गई। यह खबर जब अखबार और मैग्जिनों में छपी, जिसके लिए भगत सिंह काम किया करते थे तो पूरे विश्व में तहलका मच गया। ना केवल भारत से बल्कि अंग्रेज सरकार पर रसिया और इटली के सरकार से भी दबाव बनाया जाने लगा कि वह भगत सिंह की गलती को साबित करें या फिर उन्हें जेल से रिहा करें।

    भगत सिंह के बम विस्फोट से सरकार को किसी भी तरह की हानि नहीं हुई थी। जिस वजह से भगत सिंह पर किसी भी तरह का मुकदमा नहीं चलाया जा सका है और भगत सिंह ने उस दिन पुलिस की हत्या की थी इस बात का भी कोई सबूत अंग्रेज के पास नहीं था।

    पूरे देश की हालत बिगड़ती जा रही थी। अंग्रेज सरकार को चारों तरफ से दबाव दिया जा रहा था कि भगत सिंह को तुरंत जेल से रिहा किया जाए। अंग्रेज सरकार ने आनन-फानन में सजा की तारीख से 2 दिन पहले ही भगत सिंह को रात में फांसी देने का ऐलान कर दिया।

    यह बड़ा ही विचित्र सा फैसला था लेकिन भगत सिंह इस फैसले पर हसे और कहे कि “मेरे मरने के बाद इस देश में मरने वालों का सैलाब आएगा, उस दिन तुम कुछ नहीं कर पाओगे”।

    अंग्रेज सरकार को डर था कि जिस दिन सजा की तारीख तय की गई है अगर उस दिन भगत सिंह को फैसला सुनाया जाता है तो भारत के सभी लोग जेल तोड़ देंगे और भगत सिंह को रिहा कर देंगे।

    इसलिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दे दी गई। सबसे ज्यादा दुःख की बात यह है कि रात में ही उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया और सुबह जेल खोल दिया गया।

    कई दिनों तक देश में मातम चला, अलग-अलग जगहों पर लड़ाई, झगड़ा और आंदोलन चलता रहा। इसके बाद देश का प्रत्येक नवयुवक गुस्से से आगबबूला हो गया और अंग्रेज सरकार से लड़ने के लिए सड़क पर उतर पड़ा। भगत सिंह के मरने के बाद भारत में इतना बड़ा आंदोलन हुआ कि हर जगह लोग मरने के लिए तैयार थे या मारने के लिए।

     

    भगत सिंह की जीवनी की किताब

    एक किताब जिसे भगत सिंह ने मरने से पहले लिखा था, इसे भगत सिंह की जीवनी मानी जाती है और इस किताब का नाम Why I am Athist है। आपको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।

    भगत सिंह के बलिदान को व्यर्थ ना समझा जाए। उन्होंने छोटी सी उम्र में देश के लिए अपना प्राण न्योछावर कर दिया और भगत सिंह के शहीद होने वाले दिन 23 मार्च को प्रत्येक वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    लेखक के रूप में भगत सिंह

    भगत सिंह एक अछे पाठक, लेखक और वक्ता भी थे। इन्होंने अपने समय में कई प्रकार के लेख, पत्र-पत्रिकाएँ लिखी और इनका संपादन भी किया।

    हम यहाँ पर इनकी मुख्य कृतियां बता रहे हैं:

    • सरदार भगत सिंह: पत्र और दस्तावेज (संकलन : वीरेंद्र संधू)
    • एक शहीद की जेल नोटबुक (संपादन: भूपेंद्र हूजा)
    • भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज (संपादक: चमन लाल)

    ख्याति और सम्मान

    • भगत सिंह की मृत्यु की खबर को न्यूयॉर्क के पत्र डेली वर्कर और लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून ने छापी थी। इन ख़बरों के बाद भी कई सारे मार्क्सवादी पत्रों में खबरें तथा लेख छप चुके थे। लेकिन उस समय मार्क्सवादी पत्र भारत में प्रतिबंधित थे, इसलिए यह लेख भारत के बुद्धिजीवियों तक पहुँच नहीं सके। सम्पूर्ण देश में उनकी इस शहादत को आज भी याद किया जाता है।
    • भगत सिंह पर कई हिंदी फ़िल्में और धारावाहिक बन चुके है।

    FAQ

    भगत सिंह का जन्म कहां और कब हुआ

    भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1960 को बंगा गाँव, तहसील जरनवाला, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था।

    भगतसिंह के माता पिता का क्या नाम था?

    भगत सिंह की माता का नाम विद्यावती और उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था।

    भगतसिंह की मृत्यु कहां हुई?

    भगत सिंह की मृत्यु लाहौर जेल में हुई, जो इस वक्त पाकिस्तान में मौजूद है।

    भगतसिंह को फांसी क्यों दी गई?

    भगत सिंह ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ आंदोलन किया और अंग्रेज सरकार के प्रति अपना गुस्सा दिखाते हुए अंग्रेज सरकार के सांसद में एक बम फोड़ दिया था।

    भगत सिंह की मृत्यु कब और कैसे हुई?

    भगत सिंह को अंग्रेजी सरकार द्वारा एक बड़े अग्रेजी अधिकारी की हत्या के आरोप में 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दी गई थी।

     

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